History of Rajput Samaj

राजपूतों का इतिहास

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आज हम बात करेंगे राजपूतों के इतिहास के बारे में राजपूतों का इतिहास बड़ा ही गौरवशाली इतिहास रहा है। राजपूत अपने बल और बुद्धि से पूरे भारतवर्ष में राज किया है।

राजपुरोहित जाति का संक्षिप्त इतिहास वैदिक काल में राजगुरू पुरोहित पद पर चुने गये ऋषिगण में से बृहस्पति (जो देवताओं के राजपुरोहित थे) एवं इसी वंश में ऋषि भारद्वाज, द्रोणाचार्य, वशिष्ठ, आत्रैय, विश्वामित्र, धौम्य, पीपलाद, गौतम, उद्धालिक, कश्यप, शांडिल्य, पाराशर, परशुराम, जन्मदाग्नि, कृपाचार्य, चाणक्य आदि मुख्य है।

कालान्तर में इन्हीं ऋषि मुनियो के वंश विभिन्न गौत्रों, खांपो, जातियो एवं उप-जातियों के क्षत्रियों के राजपुरोहित होते गुए जिनमें सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, यदुवंशी - राठौड़, परमार, सोलंकी, चौहान, गहलोत, गोयल, भाटी आदि मुख्य रूप से है।

भाटियों के राजगुरू पुष्करणा ब्राह्मण है। आगे चलकर वंशानुगत रूप से परम्परानुसार राजपूत एवं राजपुरोहित होते गए तथा सुदृढ़ समाज एवं जातियां बन गई । वर्तमान में जो राजपुरोहित है, इन गोत्रो में से अलग-अलग जातियों व उप जातियों में विद्यमान है (जोधपुर, बीकानेर संभाग में सघन केन्द्रित) ।

इसी प्रकार क्षत्रिय भी अलग-अलग जातियों, उपजातियों एवं खापों में राजपूत नाम से विख्यात है। राजपुरोहितो का इतिहास में सदैव ही ऐतिहासिक योगदान रहा है। ये राज-परिवार के स्तम्भ रहे है। इन्हे समय-समय पर अपनी वीरता एवं शौर्य के फलस्वरूप जागीरें प्राप्त हुई है।

उत्तर वैदिक काल में भी राजगुरू पुरोहितो का चयन उन श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों में से होता था जो राजनीति, सामाजिक नीति, युद्धकला, विद्वता, चरित्र आदि में कुशल होते थे । कालान्तर में यह पद वंशानुगत इन्ही ब्राह्मणों में से अपने-अपने राज्य एवं वंश के लिए राजपुरोहित चुने गये । इसके अतिरिक्त राजाओं की कन्याओं के वर ढूंढना व सगपन हो जाने पर विवाह की धार्मिक रीतियां सम्पन्न करना तथा नवीन उत्तराधिकारी के सिंहासनासीन होने पर उनका राज्याभिषेक करना आदि था । ये कार्य राज-परिवार के प्रतिनिधि व सदस्य होने के कारण करते थे ।

वैसे साधारणतया इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि मात्र था । पिरोयतो की कौम एक नहीं अनेक प्रकार के ब्राह्मणों से बनी है। इस कौम का भाट गौडवाड़ परगने के गांव चांवडेरी में रहता है। उसकी बही से और खुद पिरोयतो के लिखाने से नीचे लिखे माफिक अलग-अलग असलियत उनकी खांपो की मालूम हुई है

राजगुरू जाति की कुलदेवी - सरस्‍वती माता ( अरबुदा ई) :- पंवारो के पुरोहित है और अपनी पैदाईश पंवारो के माफिक वशिष्ट ऋर्षि के अग्नि कुंड से मानते है । इनकी खांपे - 1. आँबेटा, 2 करलया, 3. हराऊ, 4. पीपलया, 5. मंडार, 6. सीदप, 7. पीडिया, 8. ओझा, 9. बरालेचा, 10. सीलोरा, 11 बाड़मेरा, 12 नागदा ।

ओदिचा-----नेतड जाति की कुलदेवी - बाकलमाता : - ये देवड़ों के पिरोयत हैं, और अपने को उदालिक ऋषि की औलाद में से बताते है। इनकी खापें:- 1. फॉदर्र, 2. लाखा, 3. ढमढमिया, 4. डीगारी, 5. डाबीआल, 6. हलया 7.केसरियो 8. बोरा 9. बाबरिया 10. माकवाणा 11. त्रवाडी 12 रावल 13 कोपाऊ 14 नेतरड़ 15. लछीवाल 16. पाणेचा 17. दूधवा

जागरवाल--जागरवाल जाति की कुलदेवी - ज्‍वाला देवी _____ जागरवाल की कोई अलग से खांप नहीं है

पांचलोड-----पांचलोड जाति की कुलदेवी - चामुण्‍डा माता ________ परासर ऋर्षि इनकी भी कोई खांप नहीं है

सीहा______ गौतम ऋषि इनकी खांपे - 1. सीहा 2. केवाणचा 3. हातला 4. राड़बड़ा 5. बोतिया

पल्लीवाल_______________गुन्‍देशा व मुथा जाति की कुलदेवी - रोहिणी माता ये पल्लीवाल ब्राह्मणों में से निकले है. इनकी खांपे - 1.गूंदेचा 2. मूंथा 3. चरख 4. गोटा 5. साथवा 6. नंदबाणा7. नाणावाल 8. आगसेरिया 9. गोमतवाल 10. पोकरना 11. थाणक 12. बलवचा 13. बालचा 14. मोड 15. भगोरा 16. करमाणा 17.धमाणिया ये सिसोदियों के पिरोयत है _______&
सेवड़-________-सेवड जाति की कुलदेवी - बिसहस्‍त माता यह जोधा तथा सूंडा राठोडो इके पिरोयत है । इनका कथन है कि इनके पूर्वज गौड़ ब्राह्मण थे ।

रायगुर जाति की कुलदेवी - आशापुरा माता ये सोनगरे चौहानो के पुरोहित हैं।

मनणा _________मनणा जाति की कुलदेवी - चामुण्‍डा ( जोगमाया ) इनके पूर्वज गोयल राजपूत का गुरू था

महीवाल:- ये पंवार राजपूतो से पिरोयत बने है। भंवरिया:- ये आदगोड ब्राह्मणों से निकले है पूर्वकाल में यह रावलोत भाटी राजपूतो के पुरोहित थे

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Note :-  इस पोस्ट में बताई गई जानकारी इतिहास book और GK  book से ली गई है।

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